के ही अर्थ में काम करता हुआ हमको मिलाऔर मैं स्वयं ऐसे ही करता हूँ। जागृति पूर्वक ही हर काम करता हूँ - इसी लिए हम सुखी रहता हूँ। ये हम जो जागृति पूर्वक काम करके, सोच के, विचार के, अनुभव करके, दे के, ले के, हम अभी तक दुखी नहीं हुआ हूँ।
इतने तो आप भी करते हो, आप इससे ज्यादा कुछ भी नहीं करते हो। उतने ही मैं भी किया हूँ। हर एक मुद्दे पर हम सुखी रहता हूँ - काहे के लिए? हम जाग्रत रहता हूँ, सुखी रहता हूँ। वो ही चीज़ करिए और भ्रमपूर्वक, हर जगह में आदमी कुंठित, प्रताड़ित, दुखी, दीन, हीन, पराश्रित[1] - ये बना ही रहेगा। इसके लिए क्या किया जाए? इसके लिए एक ही उपाय है - हर व्यक्ति को समझदार बनाया जाए। बहुत छोटा सा काम, बहुत ज्यादा काम भी नहीं है ये! अभी हम शिक्षा देते ही हैं, शिक्षा का उपक्रम बहुत सारा बनाये रखे हैं। बनाये रखे हैं - उसमें ही समझदारी को समा लेना ही एक मात्र उपाय है। इससे क्या हो जायेगी यह पूछा? इससे ये हो जायेगी - हर व्यक्ति नैसर्गिकता के साथ उचित कार्य करना सीखेगा जिससे जो प्रदूषण होने की जो सिलसिला है, वो रुक सकता है - बात यहाँ आई। उसके बाद ये कैसा रूक जायेगा भाई? इतने लोगों का काम कैसा चलेगा - ये तो हर व्यक्ति के दिमाग में तूफ़ान बैठा ही है।
जैसा की सब आदमी जो है, ये सब दुष्ट प्रवृति से सब को रोज़ी-रोटी दे दिया - ऐसा सोचा जाता है। जबकि पहले बताया, यंत्र बना करके सब का रोजी-रोटी को छीन लिया। ये बात आपके सम्मुख प्रस्तुत किया है। सबकी रोजी-रोटी कैसे छीनी? सबके लिए हम यंत्र बना दिया है, फलस्वरूप रोजी-रोटी छीन लिया। जैसा घर-घरेलु में mixi बनी हुई है। फिर बाद में काहे को सिलबट्टे में चटनी पीसोगे रे? काहेको पीसोगे? आप बताओ। अब हाथ चलाना ही बंद हो गया। पहले ये ही हाथ बढ़िया चलता रहा। क्या हुआ अब? हाथ का training आ गया - कुछ ना करो। उसी प्रकार औषधि तंत्र में भी यही है। औषधि तंत्र में तुम कुछ नहीं करना शरीर के अंग- प्रत्यंग, हम दवाई देतें हैं, उससे ही काम निकल जायेगा। उससे काम निकाल लो, उसमें पहुँचे, मियाँ लोग! वो अंग-प्रत्यंगों का काम ही नहीं करना - जैसा, विशेष करके, गुर्दे से संबंधित रोग। हम खून में होने वाली विकारों को हम छानबीन करके अलग कर देतें हैं।
अब काहे के लिए गुर्दा काम करना? पता चला चार दिन के बाद गुर्दा दूसरा लाओ। इस ढंग से जो हम भिड़ पड़े हैं, आदमी को फसाने के कार्य में, सम्मोहन विधि से और निरूत्तर विधि - सामने आदमी के पास कोई उत्तर नहीं है। उस विधि से हम फसाये जा रहे हैं। इस पर भी पुनर्विचार करने की जो ताकत है और योग्यता है और अर्हता है और क्रियाशीलता है - ये सभी चीजें तभी उद्भूत होते है, स्वयं स्फूर्त होते हैं जब आदमी जात समझदार होता है, उसके पहले होने वाला नहीं है। भ्रमित रह करके होने वाला नहीं है। भ्रम का मूल कारण को ये समझा गया है - शरीर को जीवन समझना। तो भौतिकवाद भी वो ही कहता है - जीव, और आदर्शवाद भी हमको जीव ही कहता है। जीव से अधिक तो आदमी को बताए नहीं दोनों वाद। मैं बता रहा हूँ - आदमी जो है ज्ञानावस्था की इकाई है, समझदार होना ही ज्ञानावस्था का प्रमाण है।
पराश्रित : दूसरे के आश्रय में रहने वाला ↑