उनको अलग-अलग संभव होगा तो विधिवत संपादित करके उसको प्रकाशित करने के लिए भी हम लोग सोचते हैं, ताकि विभिन्न विषयों के जो विशेषज्ञ हैं, उनके लिए उनकी विशेष उपयोगिता, प्रयोजनीयता बढ़ जाए।
अब कार्यक्रम के समापन के तरफ हम लोग बढ़ रहे हैं, तो इस कार्यक्रम के एक अन्तिम समापन समारोह के बाबत, हम लोगों ने जैसा देखा जैसा महसूस किया वो तो हमारे दिलो दिमाग में है, पर आपने जिस तरह से उत्तरों को प्रदान किया और इतने इतने विषयों और इतने सारे लोगों को जो संतुष्ट करने के क्रम में, इसके आधार क्या रहे हैं और अंतिम समापन आशीर्वचन के रूप में आप क्या कहना चाहेंगे, उसको सुनने की जिज्ञासा है।
उत्तर : बहुत बढ़िया। ये आत्मीयता का ही सूत्र मैं मानता हूँ। आत्मीयता विधि से ही ऐसे सुनने के लिए, सोचने के लिए, निर्णय लेने के लिए, जीने के लिए, होने के लिए, अपने आप से, मायने, स्वयं स्फूर्त हो पाता है। मैं इस बात को ऐसा अनुभव कर रहा हूँ, जीवन मे जो अक्षय बल, अक्षय शक्ति वर्तमान है,
वो किसी दबाव से, किसी प्रभाव से, किसी प्रकार की भौतिक संसार से, वो उदयास्त होने की जगह में नहीं है। मुख्य बात इतना ही है। वो चीज़ आपके जीवन में भी वैसे ही है, ये बच्चों का जीवन में भी वैसे ही है, बुढ्ढों की जीवन में भी वैसे ही है। पीछे जो कई शरीर यात्रा करते हुए जो बीत गए हैं, यात्रा के, शरीर यात्रा के रूप में, जीवन तो वहीं के वहीं है, उन सारे जीवन में वैसे ही अक्षय शक्ति, अक्षय बल निरंतर विद्यमान है। पहली बात तो ये विश्वास मुझेमें है। वैसे ही मेरे जीवन मे भी ऐसे ही अक्षय शक्ति, अक्षय बल है ही। उसकी अक्षयता का मतलब है, कभी समाप्त नहीं होना है। वो जागृत होने के आधार पर, वो ही यदि भ्रमित होने की आधार पर किसी न किसी सवाल, किसी न किसी परिस्थिती, हमारा सीमा में हम जो गढ़ी हुई कोई चीज़ होने के स्थिति में, हम उसके अंदर छुप जाते हैं, हम कहीं न कहीं वहाँ ,रुक जाते हैं, हम कहीं न कहीं हमारा जो गति की आवरोधक स्थिती बन ही जाती है, हम कुंठित हो जाते हैं, जवाब देने में असमर्थ हो जाते हैं, यही आज तक गुजरी बीती हुई जो पगडंडियाँ हैं। इन पगडंडियों से ही मेरा भी यात्रा शुरू हुआ होगा, आपका भी यात्रा शुरू हुआ होगा, हर
मनुष्य जाति का यात्रा यहीं से शुरू हुआ है और हर पगडंडी में आदमी कहीं ना कहीं राजमार्ग का परिकल्पना, ख्वाब, अपेक्षा, आवश्यकता, कुछ ना कुछ तो करते ही रहा है। इससे अच्छा होना चाहिए, इससे अच्छा होना चाहिए, इससे सही होना चाहिए, इससे सही होना चाहिए, इससे और लोगों को मिलना चाहिए, और लोगों को मिलना चाहिए, इस प्रकार से मनुष्य की शुभाकांक्षा यें सदा-सदा काम करते ही आए हैं। मेरे अनुसार ऐसे जो मानव परंपरा में शुभाकांछा का जो एक बहुत बड़ी भारी राशी हो गई रही होगी, तब उस अभीष्ट की पूर्ति के लिए, प्रकृति में ऐसे ही उदार मुझको महसूस होता है, अस्तित्व स्वयं में परम उदार रूप में ही है, इस अर्थ में अस्तिव नित्य वर्तमान, नित्य प्रकाशमान, निरंतर रहस्यों और चमत्कार से मुक्त और विद्यमानता से भरपूर। कोई ऐसा भाग नहीं है, अस्तित्व अपने को किसी से ढ़क लिया हो, छुपा लिया हो। ऐसा कोई वस्तु मैंने नहीं देखा। संपूर्ण अस्तित्व ही बिल्कुल खुला मैदान, खुला चित्र, और खुला एक समझदारी, खुला एक निरंतर समाधान, खुला एक प्रमाण है। ऐसा मुझको दिखती है। और ये सदा-सदा बना रहता है। सोये रहते हैं तभी भी बना रहता है, पड़े रहते हैं बना रहता है, आप से बात करता रहता हूँ बना रहता है, चलता रहते हैं तभी भी बना रहता है। यही कुल मिला करके इसका मूल वस्तु है। इसी को मैं भाषा में कहता हूँ अनुभव।