क्या चीज़ है ये? जीवन का जो महिमा है, शरीर में जब घुलने लगता है, तो वो अपने वैभव को स्वयं बोलने लगता है, बिना बोले बोलने लगता है, ऐसा भी हुआ है।
प्रश्न : हर अंग से बोलता है बाबा, खाली मुंह से नहीं बोलता है।
उत्तर : वही आपने अभी उद्गार दिया, हर मुद्रा, भंगिमा, अंगहार में बोलती हुई सूचनाएं, मनुष्य के सभी अंग-अंग को मन को चुभता है। जो आपने बताए है, वो वोही है। जो इसका जो अभिव्यक्ति की सौरभ, मन में ही पहुँचता है। ये कान में, नाक में, हाथ में, पैर में नहीं पहुँचता है। अभिव्यक्ति की सौरभ, सुगंधी, नृत्य, ये मन में ही पहुँचता है। फलस्वरूप मन अपने आपसे खिल उठता है, हंस उठता है, वो अंग अंग में दिखता है।
इस प्रकार से जीना एक आवश्यक है मनुष्य को। ये भी नहीं है। हर मनुष्य को इस प्रकार से जीने की आवश्यकता है। इससे क्या हो जाता है पूछो। जैसा अस्तित्व निराला है, कोई छुपा हुआ, लुका हुआ नहीं है, वैसे ही हम हो जाते हैं। कुल मिला करके मैं ऐसे ही हूँ, कोई लुका हुआ नहीं, कोई छुपा हुआ नहीं, कोई दुराना नहीं, कोई संकट नहीं, कोई परेशानी नहीं, कोई समस्या नहीं। हर जगह में समाधान ही समाधान, हर जगह में हंसी ही हंसी, हर जगह में संगीत ही संगीत, हर जगह में लय ही लय, हर जगह में स्वर ही स्वर, बेसुरा तो होता ही नहीं है। ये मुख्य बात है, मुख्य बात यही है।
अब इसमें वैज्ञानिक, विवेक सम्पन्न विधि से सोचने पर यही आता है, आदमी व्यर्थ की दुख मोलता है। अस्तित्व में दुख नहीं है भगवन। क्या सुन रहे हो? अस्तित्व में दुख दर्द नहीं है। अस्तित्व में केवल संगीत है, सुख है, समाधान है, सफलता है। इसके अलावा कुछ भी नहीं है।
सारा नियति को क्या कहते हो? ये पत्थर से ले के मनुष्य तक जो व्यक्त किया है, ये सुख अभिव्यक्ति की, तकलीफ का अभिव्यक्ति है? आप स्वयं सोच लो। कितना सुखद विधि से ये अभिव्यक्त हुआ है, और इससे ज्यादा क्या गवाही चाहते हो। तो हम अपने ही भ्रांति वश, सीमायें बांध कर, हविसें बांध कर, हम परेशानी मोल लेते हैं। हविस का मतलब यही है, जिसको पहले से कहते आए हैं शेख चिल्ली, उस प्रकार से हमारा मन गढ़ंत आकारों को बनाकर, वो ना टिकने वाला आकारों को बना कर, हम टिकाऊ बनाने जाते हैं, तब हम परेशान होते हैं। बात इतनी ही है, तीसरा कुछ भी नहीं है, दूसरा कुछ भी नहीं है। उस रेखा को लाँघना ही शायद हम जागृति कह रहा हूँ। उसको लाँघना बहुत सुगम है, अभी आप हमारे सम्मुख जो चीज़़ आयी है, ये स्वभाविक रुप में ये अपने को मार्ग दर्शन करता है। जय हो, मंगल हो, कल्याण हो।
कितना अच्छा है बाबा, हम लोग उस जमाने में पैदा हुए, जहाँ “साँस लेना भी सजा लगता है”, ऐसा गाते हैं। एक-एक साँस को सजा की तरह भोगने वाला ये जो युग है, इसको जिया है हम लोगों ने, भोगा है। वहाँ से हर साँस में आनंद की धारा फूटती हो, ये पाँच दिन जो आपके साथ गुजरे, तो ऐसा नहीं लगा कि हमने जिन्दगी के पाँच दिन गुजारे हैं, वो ऐसा लगा जैसे पाँच युगों की यात्रा हमने इन पाँच दिनों में निकाली है। यहाँ पे इस यातना के शिविर से निकल कर आनंद की उंचाईयों तक, आपने जो मनुष्य जाति को ये रास्ता दिखाया, जो मार्गदर्शन किया, इस आश्रम में अपना समय दिया, इतने दूर से लोग आए। अर्चना यहाँ पर बैठी है, हर आदमी की एक भाषा होती है, जरूरी नहीं