अनुभव बिन्दु में आदमी का होना ही, ये अक्षय शक्ति का वैभव अपने आप से अस्तित्व के अनुरुप, अस्तित्व जैसा साफ-साफ प्रकाशमान है, विद्यमान है, वर्तमान है, वैसे ही हमारे सारे का सारा जीवन शक्तियाँ वर्तमान, विद्यमान, वैभवशील हो जाता है। उस वैभवशीलता में एक ही है, एक दूसरे के लिए हम संप्रेषणा, अभिव्यक्ति नाम की एक जो क्रिया कलाप है, उसको हम संपादित करते हैं। यद्यपी अस्तित्व स्वयं अभिव्यक्त है, संप्रेषित है। अस्तित्व में जो नहीं हैं, उसको हम कुछ भी नहीं कर सकते हैं। सोच भी नहीं सकते हैं। स्पष्ट होना तो बहुत दूर है। अस्तित्व में जो कुछ भी है, उतने ही हम सोच सकते हैं, समझ सकते हैं, अभिव्यक्त कर सकते हैं, संप्रेषित कर सकते हैं।
उसमें एक ऐसा संयोग और बुजुर्गों का आशिर्वाद, सर्व मानव का एक अभीष्ट, ये दोनों शायद एक जगह में आ गया। कल किसी मुद्दे पर अपन सोचते रहे, कहीं से भी दो शक्तियाँ, दो गतियाँ एकत्रित होने से, दूसरे शक्ति और गति में परिणित हो जाता है, बताते रहे। इसी प्रकार से सर्व मानव का अभीष्ट, अस्तित्व सहज अभिनव जो यथास्थितियाँ, इन दोनों का कहीं मुलाकात हो गई हैं, वो कहीं न कहीं प्रतिबिंबित होना ही था। ये कोई जरूरी नहीं है, मुझेमें ऐसा प्रतिबिंबित नहीं होता होता, और किसी से होता, आपको होता, आपको होता, आपको होता। किसी न किसी से तो लाता ही। प्रकृति की, सम्पूर्ण प्रकृति नियति के अनुसार ही, अपने नृत्य को सजाया है, वैभव को सजाया है, खूबी को सजाया है, संगीत को सजाया है, निरंतर एक प्रकार से हमारे सम्मुख पाठ ही पाठ है, झाँकि ही झाँकी है। हम पढ़ने में जितना मन लगाते हैं, निष्ठा लगाते हैं, वो उतने ही हमारा स्वत्व होता जाता है। शायद इसी क्रम में मुझको ऐसा कुछ हो गई, हमारा त्रिशा और जो अस्तित्व की एक परम उदारता, इन दोनों की कहीं मुलाकात हो गई, उस बीच में हुई वैभव इस प्रकार से आने लगी। यही गुरु मंत्र है।
तो अब रह गया आप लोगों का अनुपम, स्नेह कहो, विश्वास कहो। तमाम प्रकार की लोगों के बीच में हम पहुँचा, कुछ लोगों ने कुछ कहा, कुछ लोगों ने कुछ कहा। तुमने हिंदी भाषा को अपना करके तुम अपने जो प्रगती था, भविष्य था, इस विचारधारा का भविष्य को तुमने अंधकार में डाल दिया, ऐसा बोले। मैंने उसके एक छोटा सा प्रयोग किया - आप लोग बाकी भाषा जानते हैं कि नहीं? कहते हैं हाँ, आप इसको समझते हैं कि नहीं? समझते हैं। तो उस भाषा में तुम ही कह ले, तू ही कह ले भाई। हमको उर्दू भाषा नहीं आता, आपको तो आता है, आप ही कहो, आप काहे के लिए उर्दू भाषा सीखे हो। आप ही कह लो। ये कोई नियम नहीं है, एक ही व्यक्ति सभी भाषा में, अपने को प्रस्तुत करना। ये तो ज्यादती होगी। बहुत है, हम बिना पढे ही, लिखे ही, और स्कूल ना जाते हुए भी, हम किसी एक भाषा में अपने को, जैसा भी टेढ़े हैं, मेढ़े हैं वस्तु को अपने स्वरूप में हम प्रस्तुत करने में हम सफल हैं। वस्तु को सफल करने में हम अपने में सफल होने का एक सुख हमको मिला है। वही सुख हमको जियाता है।
प्रश्न : ये जो सुख की स्थिति है, वो एक तरफ तो आपका अनुभव है और दुसरे तरफ अभिव्यक्ति में आप समर्थ हो गए, ऐसा जो दो तरफा जो संयोग बना।
उत्तर : वही तो, वही तो सुख हुआ, ये केवल अनुभव हुआ तो हम अभिव्यक्ति में यदि असफल होते ना, हमारे में ये रौनक नहीं होता। जिस रौनक से हम जीता हूँ। ठीक है, ये तो आप मानोगे, ये शरीर का रचना वगैरह जो सामान्य लोगों के जैसा ही है, ये रौनक अपने जगह में करोड़ों में एक ही दिखता है। ये दोनों चीज़ को हम अनुभव करते हूँ।