है वो शब्दों से बोले। मेरे एक मित्र थे, वो नाचा का बहुत करते थे कार्यक्रम, बोलते थे नाच ही मेरी भाषा है, मैं कैसा नाचता हूँ, कैसे नचवाता हूँ उस भाषा में मेरी बात को सुनो। इस आश्रम में अर्चना की बहुत खिलखिला के हँसने की और कभी-कभी चुप-चुप रो देने की, इस भाषा में जो बोलती है, उस भाषा से। मनुष्य को यातना से निकाल कर, जो यहाँ तक की यात्रा, आपने इन पाँच दिनों के छोटे से समय में, पाँच युगों की यात्रा को जो आपने सम्पन्न किया, उसके लिए हम क्या कहें। बहुत सी ऐसी बातें हैं, जिसके लिए हमारे पास शब्द नहीं हैं।
बहुत एक ही शब्द है, तो हम जैसा जीये हैं, इससे अच्छे जीना ही है।