भी नहीं होता है। प्रमाण यदि संसार में अपन चाहते हैं परम्परा के रूप में, वो प्रमाण ही होगा। प्रमाण व्यवस्था में भागीदारी के रूप में ही होगी, जागृति के रूप में ही होगी, समाधान के रूप में ही होगी - ये मुख्य बात है इसमें।
तो शरीर के बारे में जो पहले आपको संक्षेप रूप में बतायी, और शरीर का संरचना गर्भाशय में होता है, और जीवन का जो स्थिति है, अस्तित्व में परमाणु विकसित हो करके जीवन पद में संक्रमित हुआ रहता है, जिनमें प्रधान भौतिक संसार का, भौतिक परमाणुओं का और जीवन परमाणुओं का जो मौलिक अंतर क्या है, इस बारे में दो बात आपको गिनाये थे। एक ये बताया था - भार बंधन, अणु बंधन। इन दोनों से मुक्त हो जाता है एक जीवन परमाणु। इसी का नाम है चैतन्य परमाणु। इसी को हम चैतन्य इकाई नाम दिया है। इस चैतन्य इकाई में जो सम्पूर्ण समझदारी को व्यक्त करने की संभावना उसी वक्त भ्रूण अवस्था में होता है। उसके बाद शनैः-शनैः जीव शरीर में कुछ होता है, उसके बाद मनुष्य शरीर के द्वारा शनैः-शनैः वो व्यक्त होते-होते आज के स्थिति में हम पूरा जागृति को व्यक्त करने योग्य हो गए हैं। यही मुख्य मुद्दा है, अभी आज के ध्रुविकरण यही है। इसको कैसा हम पहचाना? क्योंकि मैं प्रमाणित किया इसीलिए आप भी प्रमाणित कर सकते हैं, इसका मुख्य आधार यही है। मैं समझ गया, आप भी समझ सकते हैं - मुख्य आधार यही है। जब मैं समझ गए, प्रमाणित कर गए, इसी आधार पर हम आप भी, सभी मानव जाति इसको समझ सकते हैं, प्रमाणित कर सकते हैं। फलस्वरूप व्यवस्था अस्तित्व में हम जो परंपरा के रूप में हम प्रमाणित कर सकते हैं, व्यवस्था में जी कर परस्परता में एक स्नेह, मैत्री, विश्वास को पूरा कर सकते हैं, समृद्धि पूर्वक हर परिवार जी सकता है, इस बात की आश्वासन इसमें मिलती है।
ये कुल मिला करके जीवन और शरीर के संयुक्त रूप में होने वाली प्रयोजन। और जीवन का स्वरुप के बारे में ये बताये थे - गठनपूर्ण परमाणु होने के कारण, जिसमें तात्विक रूप अंशों का घटना बढ़ना दोनों से मुक्ति पाया रहता है - ये पहला एक वैभव है। तो उसमें परिणाम होना बंद हो जाता है, परिणाम का अमरत्व ही जीवन पद है। ये मुख्य तात्विक रूप में होने वाली बात है, इसको हम समझदारी में स्वीकारने की आवश्यकता है, इस पर आप लोग ध्यान देते ही होंगे।
दूसरा महिमा ये है - जीवन की अक्षय बल, अक्षय शक्ति। अक्षय बल के रूप में भी हम आपके, सभी मानव के जीवन में समानता है, जीवन के स्वरुप में भी समानता है, और जीवन लक्ष्य में भी समानता है। अक्षय बल, अक्षय शक्ति के बारे में ये अपने में शोध करने की बात है, पहला जीवन का कल्पनाशीलता है। कल्पनाशीलता को हम कितने भी करते जाएँ, और करने की पूंजी बना ही रहती है। आशा को हम जितने भी कर पाते हैं, और करने की पूंजी यथावत बना ही रहता है। विचारों को जितने भी हम कर पाते हैं, और विचार करने की पूंजी रहता ही है। और उसी प्रकार संकल्प जितने भी करते हैं, निष्ठा कितने भी करते हैं, और प्रमाण जितने भी प्रमाणित कर पाते हैं, और प्रमाणित करने की हमारे पास पूंजी यथावत बना रहता है और प्रखर होते जाता है। इसमें और एक सोने में सुगंधी है - जितने हम प्रमाणित होते जाते हैं, और भी हम प्रमाणित होने का जो संभावना है - और प्रखर, उज्ज्वल, सही, सटीक होता जाता है।
इसको हमने देखा है। इस आधार पर हमारा विश्वास ये होता है - हर मनुष्य जीवन रूप में सामान है। क्या-क्या आया वहाँ? एक तो समानता मूल रूप में उसका स्वरुप के बारे में गठनपूर्ण परमाणु के रूप में समान है, अक्षय शक्ति