के रूप में समान है, अक्षय बल के रूप में समान है और लक्ष्य के रूप में समान है। जीवन लक्ष्य जो है, वो ऐसा पहचाना गया - सुख, शांति, संतोष, आनंद - ये ही जीवन चाहता है। और मानव अपेक्षा चार होता है, उसी के साथ-साथ - समाधान, समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व। जीवन का अध्ययन मानव ही कर पाता है। शरीर के साथ ही रहेगा। शरीर के साथ ही रह करके जीवन का अध्ययन करेगा, जीवन जागृति को प्रमाणित करेगा, मानव परम्परा में ही प्रमाणित होगी, और कोई परंपरा में ये प्रमाणित होने वाला नहीं है। यही मौलिक वरदान है मानव कुल के लिए। मानव कुल का मौलिक वरदान की ओर हम अभी तक पहुँच नहीं पाए, पहुँचने के लिए एक रास्ता को खोजते रहे, वो रास्ता इस प्रकार से मिलता है।
इस ढंग से शरीर की रचना गर्भाशय में होते हुए जीवन की सम्पूर्ण जागृति को प्रकाशित करने योग्य रचना रहता है। ये मानव परंपरा में ही प्रमाणित होने की बात है। मानव परंपरा में ही मानव मानव-पद में, देव-मानव पद में, दिव्य-मानव पद में प्रकाशित होकर अपने जीवन जागृति को व्यक्त कर देता है - ये कुल मिला करके मतलब है। और मानव पद में क्या होता है, देव-मानव पद में क्या होता है - बात आती है। इसके बारे में ये तालिकाऐं बन चुकी हैं मानव व्यवहार दर्शन में और मनोविज्ञान शास्त्र में - ये सब चीज़ें काफी विस्तृत रूप में बतायी गई हैं। यहाँ एक संक्षेप रूप में ये बताया जा सकता है, बताये जा रहे हैं कि जैसा हमारा आशा, विचार, इच्छा, संकल्प, प्रमाणिकता, आदि जो कार्य हैं, इसको एक व्यवस्थित ढंग से तालिका बनाने से यही बनता है - बल को हम स्थिति में देखते हैं, और गति में शक्तियों को देख पाते हैं।
जैसा आशा को गति में देखते हैं, आस्वादन को स्थिति में देखते हैं। आस्वादन आपके स्थिति में ही हो पाता है, आस्वादन आप करते ही हैं और मैं भी करता हूँ, ये स्थिति में होता ही है। आस्वादन के लिए चयन कहीं ना कहीं बाहर से ही होता है और उसको भी हम जानते हैं। तो बाहर से, भीतर से मतलब क्या होता है? एक तो सम्बन्ध के आधार पर मूल्य आता है, मूल्यों को आस्वादन के आधार पर चयन होना एक विधि है। संवेदनाओं के आधार पर चयन होना दूसरा विधि है। संवेदनाओं के आधार पर जो चयन होती है, उसको भ्रमित विधि देखा गया है। और मूल्यों पर जो चयन होता है, उसको जागृति विधि के रूप में पहचाना गया है।
तो उसके बाद विचार आती है, विचारों में जो विश्लेषण करने की कार्यक्रम है, वो नजरिया पर आधारित रहता है। मानव के पास नजरिया के दो ही तरीका है। एक तरीका है - प्रिय, हित, लाभ; दूसरा तरीका है न्याय, धर्म, सत्य। इन दो तरीके से जीवन जो है ना अपने को विश्लेषित करने के लिए कोशिश करता है और जब प्रिय, हित, लाभ के साथ जब विश्लेषित करने जाता है, इन्द्रिय सापेक्ष विधि से विश्लेषित करता है। जब कभी ये यदि न्याय, धर्म, सत्य के साथ विश्लेषित करने जाता है, अनुभव के आधार पर विश्लेषित करता है। इसका मूल पहचान यही है। जीवन ही अनुभव करता है, आत्मा ही अनुभव करता है, ये बात आगे आता है।
इसके बाद आता है साक्षात्कार और चित्रण। चित्रण में स्मृतियाँ काम करते हैं, जो शब्दों का स्मृति होती है, रूप का भी स्मृति होती है। किन्तु धर्म और स्वभाव का स्मृतियाँ नहीं होती हैं। और इसका साक्षात्कार ही होना पड़ेगा। स्मृति से केवल स्वभाव धर्म को पहचाना नहीं जा सकता। शब्दों से पहचाना नहीं जा सकता। इसको शब्द के अर्थ में पहचाना जा सकता है। धर्म एक शब्द है, धर्म के अर्थ को हम पहचानते हैं, साक्षात्कार करते हैं। जैसा - मनुष्य सुख