समझदारी का प्रमाण है समाधान, समाधान का प्रमाण है सुख, समृद्धि, अभय, सह-अस्तित्व - ये सुख का प्रमाण हैl हर दिन के रोज-मर्रे की काम है - जो हम सब चाहते ही हैं। तो इसको कैसे हम अनुभव किया? हर एक परिवार में ये समृद्धि चाहते ही हैं। एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति से समाधान चाहता ही है और एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति के परस्परता में निरंतर स्नेह विश्वास ही चाहते हैं, भयभीत होने नहीं चाहते हैं - यहाँ तक तो हम आ चुके हैं। पहले कोई समय में तो घर के स्वामी आने से सब घर के अंदर घुस जाना या रास्ते में भाग जाना, ऐसा करते रहे होंगे, किन्तु आज तो ऐसा नहीं है। तो हर बच्चे हर गृह स्वामी को भी जाँचने की जगह में आ गए हैं। इसलिए हर गृह स्वामी का काम ही ये बनता है - स्नेह पूर्वक, विश्वास पूर्वक परिवार के साथ जीना। तब गृह स्वामी की जगह में क्या होता है - क्या बताया - घर परिवार की एक भागीदार है, एक सदस्य है - यही कुल मिला करके प्रमाणित होता है। यदि हम इसको सच मानते हैं - भागीदारी को हम सच मानते हैं, और साथ-साथ रहना हम यदि सच मानते हैं, उस स्थिति में समझदारी को समझना एक अनिवार्य रूप हो गई। ये मूल में क्या बना? मानव जीवन के संबंध में जो मुख्य उपलब्धि है, वो जीवन समझदार होने की विधि में है। क्यों है? मनुष्य शरीर समझदारी को प्रमाणित करने योग्य है। जीव शरीर उसके योग्य नहीं है। इतनी ही बात है।
👉 विडिओ संदर्भ देखें: Video 3, time 00:00-15:27
अभी अपन ये समझने के लिए कोशिश किए थे और समझाने के लिए प्रयत्न किए थे, मनुष्य ही जीवन और शरीर का संयुक्त रूप में है। जबकि जीव कोटि के जीव भी, कई जीव, शरीर और जीवन के साथ रहते हैं, केवल मनुष्य ही समझने योग्य है और प्रमाणों को प्रमाणित करने योग्य है, इस बात की पुष्टि में इसके पहले आपके सम्मुख प्रस्तुति हुई थी। मैं विश्वास करूँगा उस पर आपका ध्यान गया है, उसमें आप विश्वास करेंगे। उसके आधार पर हम आगे की कड़ी ये बताना चाहते हैं और शरीर की जो संरचना है मनुष्य की, ये मूलतः उस तरीके से बनी हुई है - सभी धातुऐं और मेधस तंत्र - जो जीवन अपने जागृति को व्यक्त कर सकता है। इससे कम विकसित मेधस तंत्र और सप्त धातुओं का सम्मेलन में संतुलन जीव संसार में है। उसके पीछे की जो संसार है, भौतिक संसार और रासायनिक संसार, उसमें मेधस तंत्र का कोई लक्षण नहीं है, और ना उसमें वो प्रकाशन है, ना उसका प्रमाण है।
इस ढंग से अपन निश्चय कर सकते हैं तो हमारा जो कुछ भी अभी चिंतन है, ये मानव से संबंधित ज्यादा है और मानव ही जागृति को प्रमाणित करने योग्य है, और बाकी यांत्रिक रूप में रासायनिक भौतिक संसार कार्य कर रहा है, इसके बावजूद उसमें त्व सहित व्यवस्था प्रकाशित है, इस बात को आपको यकीन दिलाया है। मनुष्य ही एक मात्र ऐसा इकाई है, अपने त्व सहित व्यवस्था को पहचान नहीं पाया है अभी तक, दो प्रकार के चिंतन आने के बावजूद, अभी तीसरे प्रकार के इस चिंतन से आप हम त्व सहित व्यवस्था होना, हम पहचान सकते हैं। ये इसका मूल मुद्दा थी। जीवन और शरीर के संयुक्त रूप में होने का मुख्य प्रयोजन क्या है? मानव अपने मानवत्व सहित अपने प्रमाणों को प्रस्तुत कर सकता है। प्रमाणों को प्रस्तुत करता है तो व्यवस्था में ही होता है। व्यवस्था के अलावा दूसरा कोई प्रमाण