धर्मी है। सुख शब्द में नहीं आता है और साक्षात्कार में आता है, अनुभव में आता है, चिंतन में आता है, बोध में आता है। ये हम संकल्प में, संकल्प पूर्वक प्रवर्तित होकर प्रमाणित करते हैं। इस ढंग से चिंतन पूर्वक चित्रण जो होता है, न्याय धर्म सत्य के आधार पर ही चित्रण होना शुरू हो जाता है। माने हम जितने भी कार्यक्रमों को बनाएंगें, वो सभी चित्रण न्याय, धर्म को प्रमाणित करने के अर्थ में ही होता है। इतने में से क्या हो जाता है? जो संवेदनाऐं रहते हैं मनुष्य में, वो संवेदनाऐं इनमें नियंत्रित हो जाते हैं।
क्या होते हैं? सबसे बड़ी भारी भूमिका यही है - चिंतन पूर्वक जीने का प्रमाण यही है, संवेदनाऐं नियंत्रित हुआ, या नहीं हुआ। उसको हर व्यक्ति जाँचा करो। उसमें हर व्यक्ति को उतना ही अधिकार है जितना मुझको अधिकार है। वो आप अपने में जाँच करके देखिये, यदि संवेदनाएँ नियंत्रित हुई हैं, न्याय धर्म सत्य के जो चौखट में ये संवेदनाऐं अपने को स्थिर होना पाया, माने संवेदनाऐं नियंत्रित हो गईं। यदि संवेदनाऐं न्याय धर्म सत्य की चौखट से बाहर भागने लगा, ये नियंत्रित नहीं हैं, ये बात को हम अच्छी तरह से पहचान सकते हैं। ये बहुत अच्छी एक अपने को जाँचने की स्थली है। यदि इस कसौटी से हम उभर जाते हैं, स्वाभाविक रूप है न्याय धर्म सत्य का बोध होता ही है। ये अध्ययन क्रम में होने वाली प्रक्रिया ही है। इन क्रम में तो जैसा ही न्याय धर्म सत्य अपने आप में यदि हमको बोध हुआ, वो तुरंत ही संबंधों का बोध पहले से ही रहता है, चित्रण रहता ही है और साक्षात्कार रहता है। संबंधों में मूल्यों को निर्वाह करने में हम सक्षम हो जाते हैं। जो-जो संबोधन तो हम पहले से, अभी से कर रहे हैं - माई, बाप सब करते रहते हैं किन्तु वो आयु, परिवेश, परिस्थिति, आवश्यकता - ये सब को ध्यान में रख करके ये बदलती चली जाती है। क्या चीज़? निर्वाह करने की बात। क्या निर्वाह करने की बात? विश्वास को निर्वाह करने की बात। एक समय में जैसा विश्वास निर्वाह हुआ, दूसरी बार ऐसा नहीं हो पता है। कब तक?
भ्रमित रहते तक विश्वास सा लगता है, विश्वास हुआ नहीं रहता है। विश्वास होने के लिए हमको साक्षात्कार होना बहुत अनिवार्य है। हर संबंधों का जो स्वभाव धर्म है, ये हमको साक्षात्कार होने की आवश्यकता है। तो इन साक्षात्कार विधि से हम आगे चलते हैं, इसमें कसौटी की बात कह दी थी। तो जैसा ही हम संवेदनाओं को नियंत्रित पाते हैं, हम हमारा कसौटी ठीक है, हम अपने में स्थिर हुए, निश्चित हुए, निश्चिन्त हुए, निश्चल भी हो गए। इसमें जो दोहरा व्यक्तित्व की संभावना मर जाता है। यही मृत्यु होती है। इसी स्थल में हर व्यक्ति इसको अनुभव करेगा, दोहरा व्यक्तित्व का मृत्यु स्थली यही है। जिस क्षण में, जिस महूरत में हम अपने को ये जाँच पाते हैं कि संज्ञानशीलता में संवेदनाऐं नियंत्रित हुआ। उसी क्षण में मृत्यु होती है दोहरे व्यक्तित्व की। दोहरे व्यक्तित्व ही है भ्रम का सबसे भारी कवच। यही भ्रम और जागृति का नीर क्षीर न्याय हो पाता है, इसका लक्ष्मण रेखा यहीं बन पाता है। सही गलती का लक्ष्मण रेखा यहीं बनता है। जागृति भ्रम का भी लक्ष्मण रेखा भी यहीं बनता है। इस बात को हम अच्छी तरह से पहचान सकते हैं। इस ढंग से जीवन वैभव कितना ज़बरदस्त है इसको आप हम बोध कर सकते हैं।
इस बोध के पश्चात स्वाभाविक है बोध को प्रमाणित करने के लिए हम तत्पर होते हैं, अनुभव होते ही हैं, अनुभव विधि से हम पूरा जीवन अभिभूत होता है। अभिभूत होने का मतलब - अनुभव के रूप में सभी प्रक्रियाएँ होने लगता है। अनुभव के तारतम्य[1] में सभी प्रक्रियाएँ होने लगता है। अनुभव आत्मा में होता है। आत्मा में अनुभव किया हुआ,
तारतम्य : जोड़मेल, क्रम या सिलसिला ↑