करना मनुष्य ही करता हैl जीव जानवर - कुत्ता, बिल्ली, गधा, घोड़ा - ये कोई नहीं करते हैं। तो हम मनुष्य को गधा, घोड़ा, कुत्ता, बिल्ली के साथ जोड़ करके हम भाषा सिखाते हैं, कार्य प्रणाली को सिखाते हैं, नीति शतक को सुनाते हैं, हम कितने अच्छे आदमी हैं, भद्दे आदमी हैं - आप ही मूल्यांकन कर लो।
ठीक है? तो इसमें यहीं से शुरू होता है - हमारा सारा बैसाखी इससे से छूट जाता है, सारे भ्रम टूट जाते हैं, सारे अतिवाद ध्वस्त हो जाते हैं और उसके बाद स्वच्छंद[1] मानव के रूप में हम जीना बन जाता है। उसका प्रमाण मैं स्वयं हूँ। ऐसे आप भी हो सकते हैं, और भी हो सकते हैं, समग्र व्यक्ति प्रमाण बन सकते हैं। यही हमारा सोचना है, समझना है, सर्व शुभ की संभावना को हमने जो परिकल्पना में देखा और संभावना में देखा, योजना में देखा, कार्य योजना में देखा - इसी को देखा है। इस विधि से हम आ गए,दर्शन की बात आ गई। दर्शन का मतलब ही होता है समझना। समझने का मूल मुद्दा चिंतन ही है, चिंतन ही समझने का पहला सीढ़ी है। दूसरा सीढ़ी क्या है? स्वीकार हो जाना, माने बोध हो जाना।
तीसरा सीढ़ी क्या है? अनुभव हो जाना, माने तृप्त हो जाना, जिसको हम साक्षात्कार किया, बोध किया, उससे हमको तृप्ति मिल जाना - इसका नाम है अनुभव। ठीक है? साक्षात्कार और बोध का तृप्ति बिंदु आ जाता है। उसी स्थिति में आती है कर्म स्वतंत्रता, कल्पनाशीलता की तृप्ति बिंदु। उसी महूरत में आता है - कर्म स्वतंत्रता का तृप्ति बिंदु और कल्पनाशीलता में, कल्पनाशीलता का तृप्ति बिंदु कर्म स्वतंत्रता में होना कैसा होता है, वो तुरंत उसका ध्रुवीकरण हो जाता है। तो उसी के साथ-साथ कर्म करते समय में स्वतंत्र और फल भोगते समय में परतंत्र वाला जो बात रहती है, उसका निराकरण हो जाता है। कर्म करते समय में भी आप स्वतंत्र हो जाते हैं, फल भोगते समय में भी स्वतंत्र हो जाते हैं। वो कैसे आता है? उसका एक थोड़ा सा स्पष्टीकरण। भ्रम पूर्वक किया हुआ किसी भी कर्म फल का परिणाम है - वो लोग बाँटने में कोई लेता नहीं। भ्रम पूर्वक किया हुआ कर्म फल है - उसको संसार में बाँटने जाते हैं, वो कोई लेता नहीं है।
तो जागृति पूर्वक किया हुआ कर्म फलों को हर व्यक्ति घर में, घाट में, दरवाज़े में और रस्ते में, हर व्यक्ति झोकने के लिए तैयार बैठा रहता है। इस ढंग से जो हम जागृति पूर्ण विधि से कर्मों को करते हैं, उसका फल को हम कितने भी बाँट सकते हैं। और भी कर्म कर सकते हैं और बाँट सकते हैं। इस ढंग से हम धनी होने की सिद्धांत बनता है। इसी आधार पर हम अपने आवश्यकता से जो अधिक उत्पादन करने वाले कार्य प्रणाली आती है और हमारा आवश्यकता कम होना और संभावनाऐं अधिक होना - ये भी सिद्धांत इसी के साथ जुड़ती है। इस ढंग से सब शास्त्र से और विचार से जुड़ने वाली स्थली जागृति ही है। नहीं तो बाकी सब भ्रम पूर्वक शरीर से ही जुड़ा रहता है। आप कुछ भी करो, आप कुछ भी प्रक्रिया करो, वैज्ञानिक प्रक्रिया, किन्तु शरीर से ही संवेदनाओं से ही जुड़ा रहेगा। ये शरीर संवेदनाओं से जुड़ा हुआ जितने भी कार्य प्रणाली है, कहीं ना कहीं कुंठित होता है, कहीं ना कहीं काला दीवाल में खड़ा होता है, कहीं ना कहीं पुनः जितना हम अच्छा मान करके चले थे, उससे बड़ा प्रश्न चिन्ह बन जाती है, हम स्वयं क्या किया, उसको शोध करने के लिए और आवश्यकता बन ही जाती है।
स्वच्छंद : स्वइच्छा अनुकूल आचरण करने वाला ↑