इसी क्रम में हम सब खड़े ही हैं - ज्ञानी, अज्ञानी और विज्ञानी - सभी का सभी कोई ना कोई इसी कड़ियों में हम समाये हैं। ऐसा मेरा देखने की तरीका है। तो इस ढंग से दर्शन का मतलब होता है - समझदारी की मुद्दा। समझदारी की मुद्दा में तीन ही मुद्दा बनती है - एक तो हम जीवन को समझे रहते हैं, दूसरा जो है अस्तित्व को सहअस्तित्व रूप में समझे रहते हैं, तीसरा तो इन दोनों का योगफल में हमारा आचरण, मानवीयतापूर्ण आचरण होना बन जाता है। अब मानवीयता पूर्ण आचरण होना एक सहज क्रिया होने से मनुष्य परिवार में भी सुखी, मानव समाज में भी सुखी, मानव राज्य में भी सुखी, व्यवस्था में भी सुखी, पढ़ाई में सुखी, पढ़ाने में सुखी - सभी अवस्थाओं में सुखी। उसी के साथ और परिवार के हर व्यक्ति के साथ, बड़ों के साथ सुखी, बच्चों के साथ सुखी, वृद्धों के साथ सुखी, साथियों के साथ सुखी, सम्बन्धियों के साथ सुखी - सब के साथ हम सुखी रहना बनता है। फलस्वरूप हम सुखी करना बन जाता है। इसका एक ही line है - जिसके पास जो पूंजी रहती है, जिसके पास जो चीज़ रहता है, उसी को वह आबंटित करता है। तो मनुष्य के पास सुख का क्षण भी होता है और परेशानी का क्षण भी होता है। परेशानी का क्षण में आदमी परेशानी को बाँटता ही बाँटता है, और सुख के क्षणों में सुख को बाँटता ही बाँटता है। इसी को मैंने अनुभव किया है, मैं समझता हूँ आप भी अनुभव करेंगे और सुखी होंगे। ये कुल मिला करके जीवन और शरीर के संयुक्त रूप में होने वाली प्रक्रियाएँ में से ये आ गए।
उसके बाद आता है शरीर के साथ जो जीवन का जो कार्यकलाप है, उसमें भ्रम और जागृति की दो बात पूरा हुआ। इस ढंग से हम इस ठोर में आ गए की जागृति पूर्वक हम सुखी होते हैं और भ्रम पूर्वक दुखी होते रहते हैं। ये इस प्रकार से आई महाराज। अब जागृति यदि हमारा वर होता है, उसके लिए हम जी-जान लगायेंगे ही, और उसमें हम जियेंगें ही। जिनको ये जरुरत पड़ता है, वो अपने निष्ठा को प्रमाणित करेगा ही। जिनको जरूरत नहीं है, वो नहीं करेगा। क्या आपत्ति हुई? और कैसे इसको कहोगे कहा? ये शरीर यात्रा तो बारंबार बनती रहती है, ये शरीर यात्रा में कोई नहीं माना, आगे शरीर यात्रा में अनुकूल परिस्थितियाँ बना ही रहता है, जाग्रत होने की संभावना बना ही रहता है। इस ढंग से मेरा अंतिम उद्गार है। इस ढंग से बन गई।
जय हो, मंगल हो, कल्याण हो!
अभी आप हम, जागृति के सम्बन्ध में, विश्वास करने के मुद्दे पर, कुछ समझने के कोशिश किए, समझाने की कोशिश किए। ये सफल होने की विश्वास में आगे की कड़ी।
दर्शन - ऐसे दर्शन के मुद्दे पर आपको ये स्मरण दिलाया है केवल सूचना के रूप में - व्यवहार दर्शन, कर्म दर्शन, अभ्यास दर्शन, अनुभव दर्शन। चार अध्याय में पूरा मध्यस्थ दर्शन को प्रस्तुत किया है, ये बात की सूचना पहले भी हुई है। और इसमें से हमारे साथ में जो मित्र बैठे हैं, इनका जिज्ञासा है ये अनुभव दर्शन। अनुभव दर्शन पर कुछ प्रकाश डालें, ऐसा आप कह रहे हैं। क्योंकि अभी तक अपन अनुभव का ही डंका बजा रहे हैं और यह भी हम कहना चाहेंगे अनुभव पूर्वक ही हम जो ठोस ढंग से अपने बात को प्रस्तुत करना बनता है। उसके पहले अनुभव विहीन विधि से हम प्रस्तुत तो होते हैं, किन्तु वो ठोसपन नहीं आता है, नहीं तो हमको ये कहना पड़ता है - किताब में लिखा है, तथ्य है ना, यंत्र ऐसा बताता है और मौसम का यंत्र ऐसा बनाता है, ये बनाता है, ये बनाता है, हम दूसरा कोई ना कोई संदर्भ को बता करके ही अपने सारा भाषाओं को प्रयोजित करना बनता है। नहीं तो - हमारा पिताजी ऐसा कहें थे, हमारे