बड़े लोग ऐसा कहे थे, हम लैबोटरी में ऐसा देखा - यही बताया! आप क्या किए? आप बताना बनता नहीं! ये मुख्य मुद्दा यहाँ से है।
अनुभव दर्शन में ये मुख्य मुद्दा के ऊपर काफी हस्तक्षेप किया है। अनुभव मूलक विधि से हम स्वयं ज़िम्मेवार होना बन जाती है। मैंने अनुभव किया है, ये उद्गार आता है। अनुभव के बाद अस्तित्व की नियम, अस्तित्व की नियति, अस्तित्व की प्रक्रिया, अस्तित्व में होने वाले विकास, अस्तित्व में होने वाले विकास क्रम और अस्तित्व में होने वाले जागृति क्रम, जागृति - इन सभी के साथ जुड़ करके हम कहते हैं हम अनुभव किया है। इसमें कोई एक बात को कहते नहीं हैं कि हम एक भाग को अध्ययन किया, ये समग्रता को अध्ययन किया। समग्रता में कितना सुगम है, वो बात आपको बताना चाहते हैं।
तो व्यापक वस्तु में एक-एक वस्तु होने की अवधारणा आपमें जब आ जाता है, एक-एक वस्तु में से मनुष्य भी एक-एक वस्तु में से एक है। उसमें से मनुष्य में जो विशेषता है, वो यही है - जीवन और शरीर का संयुक्त रूप। जीवन कुल मिला करके अनुभव करने वाला वस्तु है, ये आपके स्वीकृति में आ जाता है। अनुभव करने के लिए जब एकमात्र जीवन है, जीवन में ही हम अनुभव करना है अस्तित्व को सहअस्तित्व रूप में, जीवन को जागृति के रूप में - दोनों चीज़ को हम अनुभव ही करना है। इसको दूसरा कोई machine बता नहीं पाता है, ना कोई दूसरा विधि है, ना किताब बता पाता है, हर व्यक्ति ही अनुभव का ज़िम्मेवार है। अनुभव करने में कोई machine को, कोई माध्यम को हम यदि कहें ये ठीक है, वो होने वाला नहीं। मनुष्य ही अनुभव करेगा, मनुष्य ही ज़िम्मेवार होगा। मनुष्य ही ज़िम्मेवार होने के आधार पर समझदारी के कसौटी में ज़िम्मेवारी को निरंतर जांचेगा। क्या ज़िम्मेवारी के बारे में? व्यवस्था में जीना ज़िम्मेवारी है। समझदारी पूर्वक हम जीते हैं, व्यवस्था में जीना ही बनता है। दूसरा कुछ बनते ही नहीं। ये व्यवस्था को ही हम नियति कहते हैं।
समग्र व्यवस्था को हम नाम दिया है नियति। नियति ही समग्र व्यवस्था है, इन समग्र व्यवस्था में भागीदारी होने के लिए हम समझदार होते हैं, फलस्वरूप व्यवस्था में भागीदारी करते हुए हम प्रमाणित हो जाते हैं। यही अनुभव का दृष्ट फल है, माने जीता जागता फल ये ही है। इन फल को प्रयोग करने के लिए आदमी, हर आदमी अपने में अनुभूत होना, किस में - सहअस्तित्व में अनुभव करना, अनुभव किए रहना, एक आवश्यकीय मुद्दा है। जब कभी अनुभव होगा सह-अस्तित्व में ही अनुभव होगा, दूसरी जगह में अनुभव नहीं होता है। इसके पहले एक अवश[1] में आदर्शवादी विधि से एकांत में अनुभव होता है, ये बात को सूचना में दी थी। और उसको समाधि स्थली बताई गई, उसको हम अच्छे भले प्रकार से देखा। उसमें ये निकलता नहीं है - मैं अनुभव किया हूँ, ये हम घोषणा नहीं कर सकते। हम चुप हो जाते हैं। चुप होने की बात वहाँ बनता है। ना हम समझदार हूँ, ये भी हम बता नहीं पाते, ना नासमझ हूँ, इसको हम घोषणा नहीं कर पाते। इस प्रकार की स्थिति हम आ जाते हैं। इसको भले प्रकार से देख लिया गया है। अभी हम आपको जो कह रहे हैं, ये भी देखा है। तो सह-अस्तित्व में अनुभव होने की स्थिति में, हम सहअस्तित्व को समझा हूँ, ये समझ में आता है। जीवन को हम जीवन के रूप में यदि हम पूरा का पूरा अध्ययन कर पाए हैं और उसको
अवश : बेबस, लाचार; इंद्रियों का दास ↑