अनुभव कर लिए हैं, प्रमाणित करने के लिए योग्य हो पाए हैं, उस स्थिति में जीवन का अनुभव मुझमें हो गई है। इसको भी हम घोषणा कर सकते हैं।
जीवन का अनुभव होने के आधार पर हम न्याय धर्म सत्य को प्रमाणित करना बन जाता है। और अस्तित्व में अनुभव होने के आधार पर समग्र व्यवस्था में भागीदारी करना बन जाता है। सभी प्रयत्न का जो अभीप्सा[1], आवश्यकता और जागृति का पहचान, ये इतने में ही होता है। इससे ज्यादा कुछ होता नहीं, इससे कम में आदमी प्रमाणित नहीं हो पायेगा। इससे कम में भी प्रमाणित होना संभव नहीं है, इससे ज्यादा कुछ प्रमाणित होने की आवश्यकता बनती नहीं। समग्र व्यवस्था में भागीदारी करने के बाद जीवन में जीवन को हम न्याय धर्म सत्य के रूप में प्रमाणित करने के स्थिति में हम आ जाते हैं, यही ज्ञानावस्था की एक बहुत बड़ी भारी उपलब्धि, प्रमाण और परम्परा के रूप में प्रमाणित होने की संभावना, ये सब एक साथ उदय होता है। किस आधार पर उदय होता है? इसके पहले बताया था - चिंतन में हम सही गलती का, जागृति और भ्रम का हम लक्ष्मण रेखा को देख लेते हैं। इस पार भ्रम है, इस पार जागृति है - इस ढंग से आने लगता है।
उसी प्रकार न्याय इस पार है और इस पार में अन्याय है। इसी प्रकार समाधान इस पार है, उस पार में समस्या है। इसी प्रकार असत्य इस पार है, इस पार में सत्य है। इस बात की साक्षात्कार हमको हुआ रहता है। यही साक्षात्कार की महिमा है, इन महिमा के आधार पर हम कुछ भी योजना बनाते हैं, हम प्रमाणित होने के अर्थ में ही बना पाते हैं। इसी को प्रमाणित करने के अर्थ में ही योजना होती है, चाहे कुछ भी कर लो। कोई ही यंत्र बना लो, कोई भी इमारत बना लो। अंततोगत्वा मनुष्य की जहाँ तक मूल्यांकन है, प्रमाणित होने के मुद्दे पर ही आ के टिकती है, प्रमाणित होना बन जाता है। इसीलिए मनुष्य को अनुभव मूलक विधि से जीना आवश्यक है और अनुभव मूलक विधि से, अनुभवगामी पद्धति से अध्ययन कराना भी आवश्यक है। दोनों एक साथ ये आता है। जो हम अनुभव किए रहते हैं, प्रमाणित हुए रहते हैं, अनुभवगामी विधि से हम अध्ययन के लिए अपना योजना बनाते ही हैं।
इस ढंग से अनुभव दर्शन में इस बात को स्पष्ट करने की कोशिश किया है जीवन एक ऐसी अमूल्य वस्तु है, नियति सहज उपलब्धि है, जो इसमें कोई भी ना तो किसी का हस्तक्षेप है, ना तो कोई व्यापक वस्तु इसको बनाने बिगड़ने में नहीं लगा है या एक-एक वस्तु दूसरे के साथ जीवन को बनाने में बिगड़ने में कुछ भी हस्तक्षेप करने में नहीं है। माने ये जीवन को हर एक-एक जीवन के स्वरुप में होने के लिए और जीवन के स्वरूप में प्रमाणित होने के लिए, जीवन के स्वरुप में निरंतर रहने के लिए ये निरंतर सहायक हुए, इस बात को स्पष्ट करता है। ये इस ढंग से बनता है। इस विधि से हम एक अच्छी अपने मूल्य को समझने का एक स्त्रोत बनता है। किस विधि से? अनुभव विधि से। अनुभव विधि से हम यदि अपने मूल्य को पहचान लेते हैं, वो नित्य निरंतर प्रमाणित होने का एक प्रवाह बन जाता है। इस ढंग से मैंने अनुभव किया है। तो अनुभवात्मक अध्यात्मवाद में यही है - सत्ता में मैं अनुभूत होता हूँ, सत्ता में समग्रता को अनुभव करता हूँ, सत्ता में हम समग्रता के साथ व्यवस्था का अनुभव करता हूँ। यही अनुभवात्मक अध्यात्मवाद में आता है।
अभीप्सा : मून में दबी रहने वाली तीव्र कामना या लालसा ↑