क्योंकि पहले भी आपको ये बताया था कि पूर्वजों ने एक भाषा दिया थी - अध्यात्म को व्यापक। उस व्यापक को हमने हर एक परस्परता के बीच में प्रमाणित करने की विधि दिया है और इस विधि से व्यापक वस्तु सब को बोध होने की बात आ गई। बच्चे, पाँचवी पढ़ने वाले बच्चे भी व्यापक वस्तु को पहले बोध करते हैं, उसके बाद एक -एक वस्तु को पूरा बोध करना बनता है। एक-एक वस्तु को बोध करने के लिए रूप, गुण, स्वभाव, धर्म - इन चारों को बोध करना पड़ता है। केवल व्यापक वस्तु में सर्वत्र विद्यमानता और पारदर्शीयता, पारगामियता को बोध करने की आवश्यकता बनती है। इसको हम अध्ययन करा के देखा है, लोगों को बोध होता है, ये प्रमाणित हुई तथ्य है। इसके आधार पर सबको ये बोध होगा, इस आधार पर हम शुरुवात किए हैं। इस ढंग से अनुभवात्मक अध्यात्मवाद अपने में सार्थकता को मनुष्य की जागृति के स्वरुप में सत्यापित करता है।
प्रश्न : आपने अनुभव दर्शन की बात कही, कर्म दर्शन, अभ्यास दर्शन इसके बारे में भी थोड़ा संक्षेप में कुछ जानकारी देना चाहेंगे।
उत्तर : अनुभव दर्शन परम, व्यवहार दर्शन न्याय, और जो धर्म सहज विधि से जीने के लिए - अभ्यास दर्शन और कर्म दर्शन - ये दोनों नियोजित होते हैं। इस ढंग से इन तीनों चारों अध्यायों का अंतर्संबंध जुड़ी हुई है। कुल मिला करके न्याय धर्म सत्य पूर्वक जीना ही है, इसको प्रमाणित करना ही है, जागृति को प्रमाणित करना ही है। जागृति स्वयं में सहअस्तित्व रूप में ही है। एकांत रूप में कोई जागृति नहीं है, जागृति का प्रमाण होता ही नहीं ये बताया, एकांत का अंतिम बिंदु समाधि बताया। उसमें हम अच्छे हैं, बुरे हैं - इसको हम घोषित नहीं कर सकते। हम समझा हूँ, नहीं समझा हूँ - इसको घोषणा नहीं कर पाते रहे। इसको हम अच्छी तरह से देखा है। इसके बाद कोई शंका तो होना बेकार है। यदि शंका करना है तो आप समाधि के स्थिति को प्राप्त करिए, उसके बाद आप घोषणा करिए। ये बात ऐसे ही बनता है। ठीक है? तो इसमें समय को व्यर्थ करना बेकार है और समझदार होना सही घाट है। समझदारी में प्रमाणित होने की प्रवृत्ति है और समाधि में कोई प्रमाणित होने की प्रवृत्ति नहीं है, प्रवृत्ति शून्य है। उसका अर्थ ही बताया, योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः[1], चित्त वृत्तियाँ भले प्रकार से चुप हो जाएँ, इसी को निरोध कहते हैं, वो निरोध होना होता है। निरोध होने के बाद हम प्रमाणित करने की आवश्यकता है ही नहीं। ये एकांतवाद का बहुत बड़ी भारी तोप मानते रहे, एकांत में कोई चीज़ प्रमाण होता नहीं। ठीक है?
दूसरा भाग - एकांत नाम की कोई घाट नहीं है। ठीक है? ये दोनों नहीं होने के आधार पर इसकी जो हम व्यर्थ की प्रयास करना बन जाता है और यदि किसी को कोई बहुत ज्यादा ज़रुरत होगा तो हम तो कुछ नहीं कहेंगें, किन्तु इसमें सार्थकता तो कुछ नहीं। इसको छू-छू के देख लिया गया और देख-देख करके समझा गया, और जी-जी करने के प्रयत्न में हम सोच-सोच करके पहचानी गई। ये सभी होने के बाद ये उद्गार है जो समाधि में हम एकांतवाद कहते हैं, एकांतवाद का अंतिम छोर बताये थे - एकांत नाम की कोई चीज़ का प्रमाण होता नहीं है, हम उसका साक्षी हो नहीं पाते हैं। ये कुल मिला करके मतलब है। तो अनुभवात्मक अध्यात्मवाद नाम इसीलिए रखा - एकांतवाद में अनुभव है कहते रहे, हम कहते हैं - सहअस्तित्व में ही अनुभव है। इसको हम इंगित कराया है। क्या अंतर है, मौलिक अंतर?
योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः : पतंजलि के अनुसार चित्त की वृत्तियों को चंचल होने से रोकना ही योग है ↑