व्यापक वस्तु को अध्यात्म नाम दिया है, इसमें दो राय नहीं हैं। तो ‘आधारम आत्मानाम यत्रस्य तत्र अध्यात्म:’ (सभी आत्माओं का आधार का नाम आध्यात्म है)।
अध्यात्म या यदि हम परिभाषा करते हैं, सभी आत्मा का आधार हो। उसमें हम पदार्थ आत्मा, प्राण आत्मा, जीव आत्मा और ज्ञान आत्मा के रूप में प्रतिपादित किया है। आत्मा को हम मध्यांश को बताया है। परमाणु के मध्यांश को आत्मा बताया है। आत्मा जो है मध्यस्थ क्रिया करता है, इस कारण से आत्मा बताया है। सम विषम का जो बाधा मध्यस्थ क्रिया पर होता नहीं है, इसीलिए आत्मा बताया है। और मध्यस्थ क्रिया के अनुसार यदि आश्रित क्रियाएँ अर्थात बुद्धि, चित्त, वृत्ति और मन काम करने लग जाते हैं, इसको हम जागृति कह रहे हैं। इस ढंग से होता भी है। मैं स्वयं इसका प्रमाण हूँ। इस ढंग से ये अनुभवात्मक अध्यात्मवाद का प्रस्तुति हुई। तो इसकी सार्थकता को हर व्यक्ति अपने में समझदारी के उपरान्त प्रमाणित करने की पद्धति से, आप देखिये, इसके मूल में अध्ययन नाम की चीज़ आती है। कुल मिला करके अध्ययन वो चीज़ है, स्मरण पूर्वक अनुभव की साक्षी में, अनुभव की रोशनी में, अनुभव के अर्थ में जो स्वीकृतियाँ होते हैं, इसका नाम है अध्ययन।
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अपन लोग ध्यान दिए थे कि स्मरण पूर्वक अनुभव की रोशनी में हम जितने भी स्वीकृतियाँ पा लेते हैं - इसको हम अध्ययन कहा है। अध्ययन का परिभाषा इसी प्रकार से किया है। समझदारी का जो एक ठोर है, समझदारी पर विश्वास करने का ठोर है - वो बोध ही है। ये बोध होना - अर्थ का ही बोध हो पाता है। वस्तु के साथ अर्थ बना रहता है। शब्द के साथ अर्थ बना रहता है। शब्द के साथ जो अर्थ बना रहता है वो वस्तु सहित अर्थ है। वस्तु में निहित अर्थ सहित वस्तु है। ऐसा बनता है शब्द का अर्थ। जैसा नाम - राम एक नाम है, राम कोई वस्तु के रूप में मिल जाता है तो इसका नाम है राम। ऐसा होता है। वो वस्तु में रूप, गुण, स्वभाव, धर्म निहित रहता है। उसका नाम है - वो वस्तु का अर्थ। वस्तु के अर्थ में जाते हैं तो क्या बनता है? रूप, गुण, स्वभाव, धर्म के रूप में हमको प्राप्ति होती है और शब्द का अर्थ को हम ले जाते हैं तो वस्तु के रूप में मिलता है। वस्तु का अर्थ रूप, गुण, स्वभाव, धर्म है और शब्द का अर्थ वस्तु है। ठीक है? ये मुख्य मुद्दा है। इस ढंग से क्या हुआ? प्रमाण क्या होगा - वस्तु होगा की शब्द होगा? इसको यहाँ हम सोच सकते हैं। सोचने पर पता लगता है - वस्तु ही प्रमाण है अस्तित्व में, ना केवल शब्द। शब्द से इंगित वस्तु मिलने पर ही वो प्रमाण है। प्रमाण का स्वरुप वस्तु है, ना की शब्द। ऐसा हमको समझ में आया है।
इस ढंग से एक बहुत अच्छी बात पर सूझ-बूझ शुरू होती है - ये शायद सब को प्यार लगता होगा - तो शब्द को प्रमाण कहें, वस्तु को प्रमाण कहें - किसको प्रमाण कहें? वस्तु में रूप, गुण, स्वभाव, धर्म अविभाज्य है। ये विभक्त होकर, खंड-विखंड हो करके बिखरते नहीं है। कोई भी वस्तु रहेगा, कोई संज्ञा में रहेगा, वो उसी अर्थ को प्रस्तुत किए रहता है। क्या अर्थ को? जो रूप, गुण, स्वभाव, धर्म उसकी होता है। उसको बताने के लिए कैसे हम पा गए? सारे अस्तित्व को चार अवस्था में पाए। एक पदार्थ अवस्था, एक प्राण अवस्था, एक जीव अवस्था, एक ज्ञान अवस्था। ज्ञान अवस्था में मानव को पा करके मानव का रूप, गुण, स्वभाव, धर्म को एक सम्पूर्णता में अध्ययन कराये - शरीर और जीवन के सहअस्तित्व में। उसके बाद जीवन के रूप में पुनहः अध्ययन किए। जीवन के रूप में,